जानिए महाभारत काल में श्रापित अश्वत्थामा कहाँ दीखता है आज भी


 महाभारत काल से ही भटक रहा है अश्वत्थामा  

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दरअसल, मध्यप्रदेश  मे एक जगह ऐसी है जहां के लोग दावा करते हैं कि वहाँ कोई 5000 साल से भटक रहा है।  लोगों का मानना है की वो कोई और नहीं बल्कि  महाभारत  काल के प्रसिद्ध योद्धा अश्वत्थामा हैं. कई लोगों ने तो वहाँ अश्वत्थामा से मिलने का दावा भी किया है और कुछ लोग तो ये भी कहतें  हैं की अश्वत्थामा के सिर से हमेशा खून बहता रहता है और वो उसके लिए कभी कभी हल्दी भी लोगों से मांगते हैं । जहां लोग अश्वत्थामा को देखने का दावा करते है वो है  बुरहानपुर के किनारे ऊंची पहाड़ी पर बना असीरगढ़ का किला ।ऐसा माना जाता है कि असीरगढ़ किले के शिवमंदिर में प्रतिदिन सबसे पहले पूजा करने अश्वत्थामा  ही आते  हैं और शिवलिंग पर प्रतिदिन  सुबह ताजा फूल और गुलाल चढ़ा कर जाते हैं।

 

अश्वत्थामा को श्री कृष्ण द्वरा मिला था युगों तक भटकने का श्राप।

 

अश्‍वत्थामा  एक ऐसे योद्धा थे, जिनको महाभारत युद्ध मे कोई हरा नही पाया था,

अश्‍वत्थामा युद्ध के बाद बच गये 18 जीवित व्यक्तियों में से एक थे। पांडवों एवं कौरवो  के गुरु द्रोणाचार्य और उनकी पत्नी कृपी के पुत्र थे अश्वत्थामा।

महाभारत के युद्ध मे भीष्म के शरशय्या पर लेटने के बाद ग्यारहवें दिन के युद्ध में कर्ण के कहने पर दुर्योधन ने गुरु द्रोण को कौरवों का सेनापति नियुक्त किया. युद्ध के मैदान में द्रोण ने पांडवो  बहुत ज्यादा क्षति पहुँचायी। विपक्षी खेमे में से किसी में भी इतना सlहस नहीं था कि द्रोण के सामने खड़ा भी हो सके.  कृष्णा ने यह देखा तो उन्होंने एक योजना बनायीं. उन्होंने एक अश्वथामा नामक हाथी को मरा  हुआ देखा और ज़ोर से चिल्लाये – अश्वथामा मारा गया।  इतना सुनते ही चारों दिशाओं में  ये खबर आग की तरह फ़ैल गयी और सबने सोचा की द्रोण पुत्र अश्वथामा की ही मृयु हुई है. जब यह खबर द्रोण तक  पहुची तो वे अत्यंत भावविभोर हो गए और उसी क्षण अपने अस्त्रों का त्याग कर दिया. उसके बाद शोकाकुल हो कर चुपचाप धरती पर बैठ गए।  ठीक उसी क्षण श्री कृष्णा कने  धृष्टद्युम्न को द्रोण के ऊपर हमला करने का इशारा किया जिसके फलस्वरूप उनकी मृत्यु हुई. इस घटना से अश्वत्थामा इतने  दुखी हुए की उन्होने सारे नियम तोड़ कर युद्ध किया और अपने पिता की हत्या का  बदला लेने के लिए युद्ध खत्म होने के बाद अश्वत्थामा ने अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया था। लेकिन तब भगवान श्रीकृष्ण ने परीक्षित की रक्षा सुदर्शन चक्र से की, और अश्वत्थामा को सजा देने के लिए उनके माथे से मणि निकाल ली और गंजा कर श्राप दिया था की “हे अश्वत्थामा, तुम्हारे इस क्रूर और जघन्य अपराध  के लिए तुम्हे कभी जीवन मे मुक्ति नही मिलेगी और तुम इस धरा  पे   सृष्टि  के अंत काल तक जीवित रहोगे और भटकते रहोगे” । और तभी से अश्वत्थामा घूमते हुए ढिखाई देते हैं।  दावा करने बाले लोग देश में कई ऐसी जगहें हैं जहां अश्वत्थामा की मौजूदगी का दावा करते हैं।  लेकिन मानने बालों का मानना है की अश्वत्थामा का असली ठिकाना असीरगढ़ का किला है

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