कैसे बना “टीपू” समाजवादी पार्टी का नया “सुल्तान “।


१९ घंटे चले उठापटक में समाजवादी पार्टी ने एक नए सुल्तान को जन्म दिया है, जो जनता से पूरी तरह से जुड़ा हुआ है और अपने बुते अब उत्तरप्रदेश में समाजवाद की “नइया” पार लगा सकता है।
अखिलेश ने अपने इस अन्दाज से एक नए युग की सुरुवात की है, जो इस बात को बल देगी की अगर उत्तरप्रदेश की जनता ने उसका साथ दिया तो वो जरूर इसे उत्तम प्रदेश बनाने में कोई कशर नही छोड़ेगा ।
इस नूरा कुश्ती को सुनियोजित कहा जाये या महज संयोग की बात लेकिन इस नए घटनाक्रम ने उत्तरप्रदेश की जनता का ध्यान अपनी तरफ  जरूर खीचा है । जो जाने अनजाने अखिलेश का कद बढ़ाता चला गया ।
अखिलेश और रामगोपाल को निष्कासन होने के बाद, जिस तरह से समाजवादी कार्यकर्ताओं ने अखिलेश का समर्थन किया ,और ज्यादा से ज्यादा बिधायको ने अखिलेश के साथ होने की बात की उसने पिता मुलायम को भी बैकफुट पे धकेल दिया। क्योँकि आब समाजवादी शिवपाल में नही अखिलेश में अपना नेतृत्व देखना चाहते हैं ।यही बात है की, मुलायम के कहने पे ही आजम खान ने मध्यस्थता की और सारा मामला सुलझाया गया ।

ये सारी पटकथा एक फ़िल्मी सफर की तरह सुरु हुआ और पिक्चर के अंत में एक हीरो को जन्म दिया, जिसका नाम है सुल्तान “टीपू सुल्तान” ।

मुलायम कुनबे में ये बर्चस्व की लड़ाई के साथ साथ अपनी इमेज से बहार निकलने की भी लड़ाई थी , जिसमे अखिलेश ने जीत हासिल की है।
इस जीत के मायने बहुत हैं , इस जीत ने जहां अखिलेश को सपा का सुल्तान बना दिया वहीँ उनकी दब्बू छबी को भी ख़त्म कर दिया ,जिसका इल्जाम अखिलेश की सरकार लगभग 4.50 साल झेलती रही।

इस घटनाक्रम ने  शिवपाल को अब अपनी पार्टी में उनकी जगह दिखा दी है।देखने की बातबात है की,मुलायम का अब पूरा कुनबा अखिलेश के साथ चलने को तैयार है की नही।

अखिलेश का पार्टी में कद बढ़ने का एक मुख्या कारण है उत्तरप्रदेश में बिकास का काम. यही बात टीपू को सुल्तान बनाती है और चुनावी मौषम का नया हीरो।

समाजवादी का सुल्तान अब कमर कास चूका है, आगमी चुनाव में अब सब कुछ अखिलेश के करिश्मे पे निर्भर करता है। ये चुनाव ना ही अखिलेश का भविष्य सपा में अपितु भारतीय राजनीती में भी तय करेगा । इस चुनाव में अगर सपा को जीत मिलती है तो सारा श्रेय अकेले मुख्यमंत्री के सर बंधेगा और हारने पे भी ठीकरा पूरा अखिलेश के ही ऊपर फूटेगा।
२०१७ के दंगल में भी अगर टीपू उत्तरप्रदेश का सुल्तान बनकर उभरता है तो, टीपू के पास इतना टाइम जरूर होगा की वो अपना कैर्रीयर केंद्रीय राजनीती में बना सके और दिल्ली का बादशाह बन सके ।

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